पहाड़ बचाने को “जुझार” गाँव का जुझारू संघर्ष

पहाड़ बचाने को “जुझार” गाँव का जुझारू संघर्ष

पहाड़ बचाओ

-शिशिर सिंह

 महोबा; आसमान से बरसते पत्थर, उड़ती धूल, बंजर खेत, मटमैला पानी, करहाते लोग, धमाके और खौफजदा आंखे, खबर नरक से नहीं बुन्देलखण्ड से हैं। यह हाल है बरी और जुझार गाँव का। जहाँ नरक जैसी जिन्दगी जी रहे गाँव के लोग अब अब अवैध खनन के चलते खनन माफियों के विरोध में उतर आए हैं। पहाड़ को बचाने के लिए लोग मय पशुओं के घर छोड़कर पहाड़ों पर चले गए हैं। गाँव के दुधमुंहे बच्चे से लेकर शतायु बुजुर्ग सब आंदोलन का हिस्सा हैं। अहिंसक आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की माँग है कि जुझार पहाड़ के खनन को तुरंत रोका जाए। 700 एकड़ में फैला यह पहाड़ बड़ा पहाड़ के नाम से भी जाना जाता है। ग्रामीणों के विद्रोह तेवर देख प्रशासन के भी हाथ-पाँव फूले हुए हैं। मीडिया में खबर आने के बाद एसडीएम सदर विन्ध्यवासिनी राय, सीओ अखिलेश्वर पांडेय व माइन्स सर्वेयर आरएन यादव ने गाँव का दौरा किया और ग्रामीणों की परेशानी जानने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व श्रम मंत्री बादशाह सिंह भी गाँव वालों के समर्थन में धरने पर बैठे।

….जैसे नरक में रह रहे हों

जुझार पहाड़ ग्रामीणों की धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है, पहाड़ पर लाला हरदौल और महेश्वरी देवी का मन्दिर है। सबसे अनोखी बात यह है कि पहाड़ पर एक कुँआ है। पहाड़ पर पानी होना विलक्षण माना जाता है। लोगों के अनुसार यह कुँआ 850 वर्ष पुराना है और अब भी दुरूस्त है। लेकिन खनन माफियाओं की मनमानी और कारगुजारियों के चलते प्रकृति के गोद में बसा बरी और जुझार गाँव नरक बन गया है। लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हैं। लगातार और तेज धमाकों से यहाँ कोई भी निर्माण करना संभव नहीं है। गाँव के सारे भवनों में धमक के चलते दरारें आ गई हैं। कोहरे की तरह धूल गाँव में छाई रहती है। घरों पर डस्ट की तीन से चार इंच मोटी धूल की परत हमेशा जमा रहती है। खेत पत्थरों से अटे पड़े हैं। घर के अन्दर हों या बाहर लोगों को हर समय हादसों का खौफ रहता है। यह बेजा नहीं है क्योंकि धमाके इतने तेज होते हैं कि 40-50 किलो तक के वजनी पत्थर एक किलोमीटर के दायरे तक उछल कर चले जाते हैं। ठेकेदारों ने मन्दिरों को भी नहीं बख्शा है, पहाड़ पर स्थित लाला हरदौल के मन्दिर को विस्फोट से जीर्ण-शीर्ण कर दिया है।

गंभीर बीमारियों का शिकार ग्रामीण

खनन से प्रदूषित हुई आबोहवा ने गाँववासियों को बीमार बना दिया है। धन के अभाव में यह बीमारियाँ जानलेवा सिद्ध हो रही हैं। बहुत अधिक धूल में रहने के कारण गाँव के लोग सिल्कोसिस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। सिल्कोसिस फेफड़ो से जुड़ी एक बीमारी है जो लंबे समय तक धूल और प्रदूषण में रहने के कारण होती है। इसमें व्यक्ति के फेफड़ो में आवांछित और हानिकारक पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे सांस लेने की क्षमता, लगातार घटती जाती है। गरीब ग्रामीणों के लिए इस बीमारी का इलाज करा पाना संभव नहीं है। वैसे सूचना तो यह भी है कि इसके चलते गांव में कुछ मौतें भी हुई हैं। यही नही पिछले कुछ समय से गाँव में मंदबुद्धि बच्चों की संख्या लगातार बढ़ी है, ग्रामीण इसके पीछे भी खनन से प्रदूषित हुए वातावरण को दोषी ठहराते हैं। लगातार धूल के संपर्क में रहने से रहवासियों की चमड़ी काली पड़ती जा रही है। इसके अलावा कान और पेट की बीमारियों से भी ग्रामीण परेशान हैं।

न कोई सुरक्षा न कोई नियम

सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का, कुछ यही हाल है यहाँ के खनन माफिया का। जानकारी के लिए बता दें कि खनन माफिया खुद को बसपा नेता का रिश्तेदार बताता है।  क्षेत्र में एक भी क्रशर ऐसा नहीं है जो नियमों के अनुरूप चल रहा हो। नियमानुसार दिन में केवल दो घंटे दोपहर बारह बजे से दो बजे तक ही विस्फोट की अनुमति है। लेकिन माफिया अपनी मर्जी और सहूलियत के हिसाब से विस्फोट करते हैं। यहाँ तक कि रात को भी विस्फोट होना आम बात है। एक अन्य नियमानुसार दो इंच छेद करके विस्फोट का प्रावधान है लेकिन छह इंच के छेद करके विस्फोट किए जा रहे हैं। विस्फोटक के रूप में अमोनियम नाइट्रेट के ज्यादा इस्तेमाल के चलते खुफिया एजेंसियाँ सक्रिय हो गई है। मीडिया में खबर आने के बाद एलआईयू की टीम ने गाँव में दौरा किया है। गौरतलब है कि पिछले कुछ धमाकों में आतंकवादियों द्वारा विस्फोटक के रूप में अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग किया गया है। खुफिया एजेंसी को शक है कि यह देश के अन्दर से ही आतंकवादियों को मुहैया कराया जा रहा है। सरकार भी अमोनियम नाइट्रेट की बिक्री पर नजर रख रही है और इसको सीमित करने के लिए योजना बना रही है।

आर या पार

गांववासी खनन से कितने परेशान हैं इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सब काम छोड़ आर या पार की लड़ाई का मन बना लिया है। फसल की सिंचाई को भी ग्रामीण नजरअंदाज कर रहे हैं। केवल पुरूष ही नहीं गाँव की महिलायें भी पहाड़ को बचाने की इस मुहिम में आगे आई हैं। गाँव के लोग अब अफसरों के कोरे आश्वासानों के बजाए ठोस कार्रवाई चाहते हैं उनकी माँग कि प्रशासन जल्द से जल्द इन पट्टों को निरस्त करे।

खामोश पर खौफ नहीं

ग्रामीणों के इस विद्रोह के चलते खनन माफिया खामोश तो हैं पर न उन्हें कार्रवाई का खौफ है और न ही पट्टे निरस्त होने की चिंता। खुद को बसपा नेता का रिश्तेदार बताने वाले माफियाओं की पहुंच काफी ऊपर तक है। ऊँची पहुँच के चलते प्रशासन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता है। हालात इस कदर बिगड़े हैं कि जब-जब ग्रामीणों ने इसकी शिकायत पुलिस में की उन्हें या तो डाँट कर भगा दिया गया या जेलं डाल दिया गया। प्रशासनिक साँठगाँठ के चलते माफिया निरंकुश हो गए हैं।

समूचा बुन्देलखण्ड है इसका शिकार

ठीक यही पीड़ा बुन्देलखण्ड के अनेक क्षेत्रों की है। धरती पहले से ही बंजर है अब इसको खोखाला करने की जो साजिश दबंगो द्वारा की जा रही है प्रशासन उस पर ध्यान ही नहीं दे रहा है। ललितपुर, झाँसी, चित्रकूट आदि सहित वो सब इलाकों जहाँ खनिज मौजूद हैं वहाँ के लोग उन्हें शाप समझने लगे हैं। वह एक ऐसी नारकीय जिन्दगी जीने को विवश है, जिसके जिम्मेदार वो कहीं से नहीं है। खनन माफियाओं की कारगुजारियों की शिकायत प्रशासन पर लगातार पहुंचती रही है। लेकिन इस तरह का लंबा आंदोलन पहली बार देखने को मिल रहा है जहाँ ग्रामीण पूरे जी-जान से पहाड़ो को बचाने में लग गए हैं। पड़ोस के गाँव पचपहरा के लोगों ने भी यह देख गाँव में होने वाले खनन का विरोध शुरू कर दिया है।

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बंटवारे से और बदहाल होगा बुन्देलखंड

यहां ऐसी कोई परियोजना नहीं आई है, जो लोगों को रोजगार दे सके। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी के जमाने में झांसी में बीएचईएल (भेल), सूती मिल के साथ बिजौली में औद्योगिक एरिया विकसित किया गया था। आज भेल को छोड़कर अधिकांश उद्योग बंद हो चुके हैं…


आशीष सागर

उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े हुए तो बुन्देलखण्ड और शेष बचे उत्तर प्रदेश में जिले तो कम होंगे, लेकिन चुनौतियां भरपूर होंगी। इन राज्यों में न तो वन होंगे, न ही पर्याप्त संख्या में उद्योग। मध्य प्रदेश के छतरपुर, दमोह, दतिया, पन्ना, सागर, टीकमगढ़ एवं उत्तर प्रदेश के बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, झांसी, जालौन, ललितपुर व महोबा को बुन्देलखण्ड राज्य के नक्शे में देखा जाता है। केन्द्रीय मंत्री मण्डल में इस क्षेत्र विशेष को मिले प्रतिनिधित्व व विधानसभा चुनाव 2012 के बिगुल के साथ एक बार फिर यह मुद्दा गर्म होता जा रहा है।
bundelkhand-stateबुन्देलखण्ड के बंटवारे का गणित 
13 जिले
 : बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, झांसी, जालौन, ललितपुर, महोबा, उत्तर प्रदेश क्षेत्र से एवं छतरपुर, दमोह, दतिया, पन्ना, सागर, टीकमगढ़ मध्य प्रदेश से।  इस पथरीले इलाके में हमेशा पानी का संकट, सूखा, भुखमरी व किसान आत्महत्याओं की युगलबन्दी, कोई स्थायी उद्योग नहीं, कृषि नाममात्र की, ज्यादातर ऊसर-परती व ऊबड़-खाबड़ जमीन, पलायन। आय का अतिरिक्त कोई संसाधन नहीं है।
वन क्षेत्र : उत्तर प्रदेश के सात जिलों में अनिवार्य 33 प्रतिशत वन क्षेत्र के मुकाबले बांदा में 1.21 प्रतिशत वन क्षेत्र व अन्य की स्थिति, 21.6 प्रतिशत चित्रकूट अधिकतम से ज्यादा नहीं है। मध्य प्रदेश के 6 जिलों में छतरपुर, पन्ना इलाके में ही आंशिक वन क्षेत्र है, वह भी ईंधन उपयोगी ही है।
खनिज सम्पदा : बुन्देलखण्ड के चित्रकूट मण्डल के चार जिलों में जिस गति से खनिज संसाधनों का दोहन हो रहा है चाहे वन हो या पहाड़, उसे बचा पाने की रणनीतियां नहीं हैं। यही स्थिति मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ और छतरपुर की है, जहां सरकार ने आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी को बेतहासा खनन के लिये पहाड़ों व नदियों को पट्टे पर दिया है।
कृषि क्षेत्र : अर्थशास्त्री डॉ  अरविन्द मोहन व विश्वबैंक की रिपोर्ट कहती है कि हमारे अध्ययन का उद्देश्य गरीबी के कारकों का पता लगाना था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब 57 प्रतिशत, पूर्वी व मध्य प्रदेश में 40 प्रतिशत उद्योग क्षेत्र हैं। जबकि बुन्देलखण्ड में मात्र तीन से चार प्रतिशत उद्योग हैं। कृषि क्षेत्र बुन्देलखण्ड में 5 प्रतिशत और पश्चिमी उत्तर प्रदेश व पूर्वी क्षेत्र में 45 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, असम तथा पश्चिम बंगाल के 300 गांवों का सर्वेक्षण करके जो तथ्य जुटाये गये हैं, उसमें बुन्देलखण्ड भी शामिल था।
क्षेत्रफल : करीब 78,000 वर्ग किलोमीटर बुन्देलखण्ड का क्षेत्रफल है। सवा 2 करोड़ के करीब आबादी में 95 फीसदी लोग तंगहाल हैं।
उद्योग : आजादी की औद्योगिक क्रान्ति को छोड़ दें तो यहां ऐसी कोई परियोजना नहीं आई है, जो लोगों को रोजगार दे सके। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी के जमाने में झांसी में बीएचईएल (भेल), सूती मिल के साथ बिजौली में औद्योगिक एरिया विकसित किया गया था। आज भेल को छोड़कर अधिकांश उद्योग बंद हो चुके हैं। बरूआसागर का कालीन उद्योग और रानीपुर के करघे चरमरा गये हैं। मऊरानीपुर का टेरीकाट उद्योग गरीबों से बहुत दूर हो चुका है, चित्रकूट की बरगढ़ ग्लास फैक्ट्री, बांदा का शजर और बुनकरी उद्योग तथा कताई मिल फैक्ट्री के हजारों मजदूर परिवारों सहित पलायन कर गये हैं।
नदियां : गंगा, यमुना, वेत्रवती, केन (कर्णवती), पहूज, घसान, चंबल, बेतवा, काली सिंघ, मंदाकिनी, बागै यहां की सदानीरा नदियाँ रही हैं। इन्हीं नदियों पर बुन्देलखंड की कृषि आश्रित रहती है। केन-बेतवा नदी गठजोड़ राष्ट्रीय परियोजना बांध प्रयोगों के प्रयोगशाला क्षेत्र स्वरूप बुन्देलखण्ड के लिये प्रस्तावित है। परियोजना की डीपीआर रिपोर्ट के अनुसार 22.4 करोड़ रूपये 31 मार्च 2009 तक खर्च हो चुके हैं। जबकि इसकी कुल प्रस्तावित धनराशि 7,614.63 (सात हजार छः सौ पन्द्रह करोड़ रूपये) है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 90 प्रतिशत केन्द्र और 10 प्रतिशत राज्य सरकार से अनुदानित यह परियोजना कुल 806 परिवारों के विस्थापन और 10 गांवों के पलायन की पुरोधा है।
परियोजना क्षेत्र में दौधन बांध एवं पावर हाउस 2182 हेक्टेयर भूमि में बनाया जाना है।
इस योजना के अन्तर्गत 4317 हेक्टेयर कृषि जमीन नहरों के प्रबन्धन पर खर्च होगी। केन-बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना के अन्तर्गत छः परियोजनाओं और नहरों के विकास में किसानों की 6499 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहीत की जानी है। बुन्देलखण्ड के पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और संगठनों ने परियोजना प्रस्ताव के समय से लेकर आज तक इसका विरोध ही किया है। इसके अतिरिक्त बुन्देलखण्ड में 3500 किलोमीटर लम्बी नहरें और 1581 नलकूप भी स्थापित हैं।
तालाबों की तबाही : टीकमगढ़, छतरपुर, महोबा के विशालकाय सागर जैसे तालाबों और चन्देलकालीन जलस्रोतों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। मिटते हुए जल संसाधन बुन्देलखण्ड में सूखा जनित आपदाओं के प्रमुख कारण हैं।
खनिज दोहन : बुन्देलखण्ड में यूं तो हीरा, सोना, ग्रेनाइट, अभ्रक, बालू, रेत, सागौन, शजर, लौह अयस्क भण्डार (छतरपुर), यूरेनियम के अकूत भण्डार हैं। यहां की खनिज सम्पदा से बुन्देलखण्ड वाले सात जनपदों से ही 510 करोड़ रूपये का वार्षिक राजस्व उत्तर प्रदेश सरकार को प्राप्त होता है। राज्य सरकारों को सभी खनिज सम्पदाओं के दोहन से 5000 करोड़ रूपये राजस्व मिलता है, लेकिन बेतहासा खनिज दोहन बुन्देलखण्ड के स्थायी विकास और राज्य की अवधारणा में बाधक साबित होने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
बिजली प्लांट : झांसी के पास पारीछा वियर में ही विद्युत संयत्र से 660 मेगावाट बिजली उत्पादन होता है। अन्य हिस्सों में बिजली संयत्र स्थापित नहीं किये जा सके हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव बीके मित्तल के मुताबिक जिस तरह से उत्तराखण्ड में नये उद्योग लगने से उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में उद्योग या तो बंद हो गये या फिर उत्तरखण्ड में पलायन कर गये हैं, यदि उत्तर प्रदेश के चार हिस्से होते हैं तो विशेषकर बुन्देलखण्ड की स्थिति और भी अधिक भयानक हो जाएगी।
ज्योग्राफिकल इन्वायरमेन्ट साइंस के पूर्व निदेशक बीके जोशी के अनुसार जर्जर हो रही ऐतिहासिक सम्पदाओं के संरक्षण के बिना बुन्देलखण्ड राज्य की परिकल्पना एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने से अधिक नहीं है। जहां सरकारी विभागों में मानवीय श्रम वाली नौकरियां खत्म होती जा रही हैं और उनका स्थान कम्प्यूटर, सूचना तकनीकी ने ले लिया है, उसी के विपरीत राज्य सरकारें छोटे राज्यों के गठन को तूल देकर अपने अधिकार क्षेत्र, राजनीतिक वर्चस्व और देश के अखण्ड विकास में जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद के आधार पर अलगाव और अस्थिरता की स्थिति व्याप्त करने की तरफ अग्रसर हैं। बिना प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और लोककला के पुनर्वास के किसी भी राज्य की कल्पना निराधार है।

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(Story) जनसेवा का चोखा धंधा है एनo जीo ओo

Submitted by guru on Sat, 2011-01-29 19:08

जनसेवा का चोखा धंधा है एनo जीo ओo

  • समाज सेवा की आड़ में मेवा खाते है स्वैच्छिक संगठन
  • दहेज मे मिलता है एन0जी0ओ0
  • परिवार वाद की प्रथा है समाज सेवा
  • एन0जी0ओ0 रजिस्ट्रेशन के लिये 10 से ज्यादा है कानून
  • स्वार्थ की गिरफ्त में है परमार्थ के पैरोकार।

आमुख
समाज सेवा यूं ही नहीं पिछले 2 दशक में एक उदारी करण प्रक्रिया के बाद व्यापार का रूप इख्तियार कर चुका है बल्कि इन परत दर परत खुलने वाले राज के पीछे दफन है स्वैच्छिक संगठन के वे काले कारनामे जिनकी नजीर एक दो नही आजादी के बाद से पनपे लाखों संगठनो की जमात है। कहना गलत नहीं की इन स्वैच्छिक संगठनों के लिए 10 से ज्यादा कानून सरकार द्वारा बनाये गये हैं। जिनमंे कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860, मुम्बई पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, इण्डियन ट्रस्ट एक्ट 1882, पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950, इण्डियन कम्पनीज एक्ट 1956, रिलीजियस एंडोमेंट एक्ट 1963, चैरिटेबल एण्ड रिलीजियस ट्रस्ट एक्ट 1920, मुसलमान वक्फ एक्ट 1923, वक्फ एक्ट 1954, पब्लिक वक्फ एक्सटेंशन आफ लिमिटेशन एक्ट 1959 इनके अतिरिक्त इनकम टैक्स एक्ट के तहत 35 एसी, 35 (1 और 2) एवं 80 जी के जरिए दान की रकम पर 100 फीसदी छूट का प्रावधान है। टैक्स का पैसा देने के बजाय आम तौर पर एन0जी0ओ0 के पैसा देना सफेद पोश अपराधियों, कार्पोरेट सेक्टर की कम्पनियों के लिए अधिक मुनाफे का सौदा होता है। इसके जरिये वे मनमाफिक ब्लैक मनी को व्हाइट में बदल कर परमार्थ का तमगा हासिल करती हैं। कहना गलत नहीं होगा कि तमाम स्वैच्छिक संगठनों के संचालक भले ही अनपढ़ व अशिक्षित हों लेकिन उनके आफिस में बतौर कार्यकर्ता, आफिस मैनेजमंेंट करने वाले एम0बी0ए0, बी0टेक0, सी0ए0, एम0सी0ए0 डिग्री धारक युवा, युवक और युवतियां आफिस को गुलदस्ते की तरह सजाने का काम करती हैं। जिससे आसानी से आवश्यकता पड़ने पर विदेशी फण्डरों, अनुदान कम्पनियांे को रिझाकर उन्हें हर तरह की सुविधा मुहैया करायी जा सके और प्रोजेक्ट एन0जी0ओ0 के पाले में आसानी से आ जाये। ऐसी ही अनगिनत तिकड़म और जालसाजी का गोरख धन्धा बन चुका है और समाज सेवा का कारोबार।

समाज सेवा की आड़ में मेवा खाते हैं स्वैच्छिक संगठन व समाज सेवी बनकर खुद को आम जनमानस के बीच प्रस्तुत करना अब हाईप्रोफाइल से लेकर साधारण व्यक्ति के लिए भी व्यक्तित्व निखार देने का सिम्बल बन गया है। उसी कड़ी में शामिल है जन सेवक बनकर अकूत पैसा कमाने का जरिया जिसे आम बोलचाल की भाषा में एन0जी0ओ0 कहना मुनासिब है। इसके लिये किसी बहुत ज्यादा शैक्षिक डिग्री की आवश्यकता नहीं, एक शार्ट कट सा सीधा रास्ता है। स्वैच्छिक संगठन का निर्माण करो और खुद को समाज सेवा के क्षेत्र में सम्मिलित करते हुए इस चोखे धन्धे में फसकर स्वार्थ की गिरफ्त में परमार्थ के पैरोकार बनने का लुफ्त उठाओ। बताते चलें कि केन्द्र सरकार के अध्ययन के मुताबिक 1970 तक देश में महज 1,44,000 एन0जी0ओ0 सोसाइटी कानून के तहत पंजीकृत हुऐ थे इनकी संख्या में साल दर साल इजाफा होता चला गया और 1970 के दशक में जहां 1.70 लाख नये एन0जी0ओ0 गठित हुऐ तो वहीं 1990 के दशक में 5.52 लाख एन0जी0ओ0 बतौर समाज सेवा के क्षेत्र में उतर चुके थे। इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी सन् 2000 के बाद आयी और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 400 लोगों में एक एन0जी0ओ0 संचालित है। लगभग इस समय 33 लाख गैर सरकारी संगठन पूरे देश में क्रियाशील हैं। इनकी झोली में हर साल 80 हजार करोड़ रूपये से अधिक दान जाता है और दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले संगठनों के खाते में इसमें दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही है।

ग्रामीण विकास की संस्था कपार्ट के मुताबिक जहां करीब उसने एक हजार स्वैच्छिक संगठनों को काली सूची में डाला है वहीं सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 91 और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन करीब 350 एन0जी0ओ0 काली सूची में दर्ज हो चुके हैं। बकौल निखिल डे (आरटीआई अभियान के राष्ट्रीय संयोजक) ने केन्द्र सरकार से स्वैच्छिक संगठनों को जनसूचनाधिकार के दायरे में लाकर इन्हें सरकारी कार्यों के ठेके नहीं देने की अपील की है। वहीं अरविन्द केजरीवाल (आरटीआई कार्यकर्ता) का कहना है कि सरकार को ऐसी एजेन्सी गठित करनी चाहिए जिससे कि एन0जी0ओ0 की पारदर्शिता व जवाबदेही तय की जा सके। कुछ क्षेत्रों में तो यह भी देखने को मिला है कि परिवारवाद की प्रथा में शामिल समाज सेवा के भाई लोग अपनी पुत्रियों के विवाह के दौरान देने वाले दहेज में बतौर तोहफा घर जमाई को एन0जी0ओ0 देते हैं। वहीं उन्नाव जैसे क्षेत्र में एक महिला संचालक एन0जी0ओ0 कार्यकर्ता चकला घर चलाने के कारण लखनऊ के सेन्ट्रल जेल में सजा काटते हुए पायी जाती है। आश्चर्य होता है कि उनके इस धन्धे में प्रदेश के नामी गिरामी पी0सी0एस0, आई0ए0एस0 जैसे अधिकारी भी गुल खिला रहे होते हैं। एन0जी0ओ0 के गठन मंे बस एक 7 से 11 व्यक्तियों की सूची, संस्था का नाम, साधारण सभा के सदस्यों का नाम लेकर आप रजिस्ट्रार आफिस पहुंच जायें और नोटरी कार्यालयों में पहले से तैयार भारी भरकम उद्देश्यों से सजे हुए संविधान तैयार मिलेंगे। इन पत्रावलियों में फर्जी हस्ताक्षर करिये और रजिस्ट्रार के मुताबिक सौदा तय होने पर स्वैच्छिक संगठन का संचालन कर्ता बन जाइये।

गौरतलब है कि इन एन0जी0ओ0 के पदाधिकारियों के नाम भी हैरत करने वाले हैं यथा राष्ट्रीय अध्यक्ष, अध्यक्ष, प्रधानमंत्री, निदेशक, सभापति इत्यादि। हिन्दी वर्णमाला के जो भी मार्मिक शब्द है मसलन निरीह, असहाय, वंचित, दलित, ग्रामोदय, सर्वोदय, उत्थान, चेतना, प्रगति, समग्र, सृजन, समर्थन इत्यादि अनेकानेक ऐसे वर्णमालायें इनकी कार्यप्रणाली में शामिल होती हैं। जिनका कि कार्यक्षेत्र से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं होता है। हकीकत है कि बुन्देलखण्ड के साथ-साथ पूरे भारत में इतनी ग्राम पंचायते नहीं हैं जितने कि एन0जी0ओ0 हैं, मगर फिर भी ग्रामोदय बदहाल है, सर्वोदय पिछड़ा है, दलित उत्पीड़ित है और परमार्थ स्वार्थ की पैबन्द में हैं। परियोजनायें हासिल करने के लिए इन संस्थाओं में वह सबकुछ आम बात है जो कि परदे के पीछे ए प्रमाण पत्र धारक फिल्मों के लिए होता है। बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर जनपद में ही तकरीबन दो दर्जन ऐसे समाज सेवी माफिया हैं जिन्होने पिछले दो दशकों में न सिर्फ किसानों की आत्महत्या को भी अनुदान में कैश किया है बल्कि उनके लिये जनमंच मंे अब तो सूखा, आकाल, जल संकट, पलायन, बदहाली, गरीबी, कुपोषण, एड्स जैसे शब्द आम बोलचाल में उपयोग किये जाते हैं।
क्या इन स्वैच्छिक संगठनों को भी जनसूचना अधिकार के दायरे में लाना गलत होगा जबकि बीते 5 वर्षों में इस अधिकार के ही कारण कई सरकारी, गैरसरकारी विभाग भ्रष्टाचार के काले कारनामे उजागर करने में विवस हुयी हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में ही इस समय साढ़े छः लाख एन0जी0ओ0 समाज सेवा का काम कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में मिलने वाले पुरूस्कार, प्रशस्ति पत्र, विदेश यात्रायें भी उन लोगों को ही मिलता है जिनके पास पहुंच और मीडिया के समाचारों की बडी़-बड़ी खबरें मौजूद होती हैं और उन्हे ही कभी जल प्रहरी तो कभी भाई के नाम से पुकारा जाता है। आखिर कब तक चलेगा समाज सेवा का यह चोखा धन्धा और कब तक इनकी जालसाजी में पिसेगा देश के अन्तिम पायदान में खड़ा आम आदमी।

Thank’s & regards
Ashish Dixit Sagar

 

ब्लास्टिंग से थर्रा उठा कबरई का आफतपरी परेशान मोहल्ला

  • डेढ लाख रू0 में बिकी मौत
  • तीन सौ फुट गहरे गडढो में दफन होगे नरकंकाल

मटौध (पचपहरा)/कबरई – बुन्देलखण्ड में गुजरे तीन दशकों से लगातार जारी मौत की खदानों के चलते होने वाले हादसे व प्रकृति के अवैध दोहन और पहाड़ो को मिटाने की साजिश एक योजनाबद्ध तरीके से विन्ध्य क्षेत्र की हरियाली, जमीनो की उर्वरा शक्ति, इंसानों को बीमार बना देने वाली हवा के तहत ही शासन -सरकारों द्वारा अप्रत्यक्ष समर्थन से चलायी जा रही है। खनन उद्योग को लेकर बीते एक माह से शुरू हुआ जन संघर्ष कल दिनांक 23.10.10 को आंदोलन की एक रणनीति के बीच गुजरा है। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत होने वाली बैठक 24.10.10 के तहत एक दिवस पूर्व ही कल सामाजिक संगठनो ने खनन माफियाओं व स्थानीय पुलिस प्रशासन की अप्रिय घटना के चलते विशाल नगर (कबरई) / पचपहरा मटौध के खनन मजदूरों, महिलाओं के साथ बीते एक माह पूर्व ब्लास्टिंग मे मारे गये स्व0 उत्तम प्रजापति 8 वर्ष पुत्र छोटे लाल प्रजापति के आफतपरी परेशान मोहल्ला में आहूत की गयी।

उल्लेखनीय है कि उक्त स्थान व पचपहरा पहाड़ (सिद्ध बाबा) वही स्थान है जहां पर हुइ असमय की गयी पहाड़ ब्लास्टिंग के समय तकरीबन एक कि0मी0 दूर जाकर गिरे पत्थर से दुर्घटित हुये मृतक उत्तम का निवास गृह था। आयोजित बैठक में शामिल प्रवास सोसायटी के आशीष सागर व बुंदेलखंड रिसर्च ग्रुप फार डेवलपमेंट (बरगद) के संयोजक अवधेष गौतम ने मिली जानकारी के अनुसार बताया कि जिला खनिज अधिकारी महोबा ने फर्जी तरीके से तैयार रिपोर्ट के आधार पर प्रतिलिपि खनिज निदेशालय को करते हुये प्रतिबंधित की गयी सत्तासी खदानों को पुनः दुरूस्त मानको के साथ चालू करने की सिफारिस की है। बेबुनियादी दलीलो के चलते उनकी ही शह पर स्थानीय पुलिस प्रशासन ने मृतक उत्तम बनाम छोटे राजा पहाड़ मालिक पर दर्ज हत्या के मुकदमे को मृतक के पिता से धमकी देकर न सिर्फ उनके परिवार को घर से कहीं दूर रात गुजारने के लिये विवष कर दिया बल्कि एक झूठे बयान में हलफनामा लेते हुये यह भी लिखाया है कि – उत्तम की मृत्यु ब्लास्टिंग के पत्थर से नहीं वरन् घर में घूमते समय लगे हुये पत्थर के गिर जाने से हुयी है। अभी उक्त बयान की विवेचना रिपोर्ट आना बाकी है। लेकिन तयशुदा है कि मासूम के कातिल एक दफा फिर मौत की खदानों को शुरू करने के लिये आजाद हो जायेगे।

कल की बैठक में स्थानीय मजदूरो को संगठित कर सात व्यक्तियों को नामित किया गया जिन्हे मोहल्लेवासियों एवं ग्रामीण तबके के लोंगो को जागरूक करने के लिये निम्न भूमिकाये भी सौपी गयी है। जिनमे जल संकट, भूस्खलन, कम वर्षा, सूखा और अकाल, बंजर होती कृषि भूमि, बाल श्रमिक, महिला हिंसा, सिलकोसिस, टी0वी0 आदि घातक दुष्परिणामों के लिये जनपद महोबा के लोगो को जाग्रत करना है।

गौरतलब है कि ब्लास्टिंग का समय दोपहर 12 बजे से 2 बजे के मध्य हैं किंतु कल बैठक मे उपस्थित लोग खुद इस बात के गवाह है कि दोपहर 2:30 बजे तक एवं सायं 6:47 तक बराबर चंद कदमों पर किये जा रहे कीर्तन सिद्ध बाबा पहाड़ी एवं सैकड़ो मजदूरो के द्वारा शुरू किये गये सत्याग्रह के बाद भी बमबारी की जाती रही है। गाटा सं0 977 पचपहरा पहाड़, गाटा सं0 967 गंगा मैया, गाटा सं0 323 लौड़ा बाबा में 300 फुट तक के गहरे गडढे व 200 मी0 ऊपर तक के पहाड़ो को जमीन का पानी निकाल कर मौत की खदान बना दिया गया जिसमें शायद हर साल मरने वाले गुमशुदा मजदूरो, विकलांगता के शिकार बदहाल श्रमिको के नरकंकालो को दफन किया जायेगा। यह भी बताया गया कि मृतक के पिता छोटेलाल प्रजापति को बतौर मौत का हर्जाना रू0 डेढ़ लाख पहाड़ मालिक ने हलफनामें के बाद दिया है जिसने कही न कही मर जाने के बदले मुवावजे की परम्परा का आहवाहन भी कर किया है। बैठक में पंकज सिंह परिहार ग्राम गुगौरा (गंज), मोहन कबरई, मृतक के परिवारी जन के अतिरिक्त बुद्धजीवी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बुन्देलखण्ड के बांदा चित्रकूट, महोबा व हमीरपुर मे पूरी तरह से पहाड़ – बालू खनन को हमेषा के लिये विराम देने की गुहार की है ताकि विन्ध्य का यह क्षेत्र रेगिस्तान न बन सके।

आशीष सागर, प्रवास

 

पहाड़ों में है पानी खींचने की एक्यूप्रेसर सोंच

  • पृथ्वी पर मौजूद वन, वनस्पतियों, जंगल में है खारे पानी को मीठा करने की प्रवृत्ति।
  • बुन्देलखण्ड में विन्ध्य पर्वत माला में छिपे हैं हीरा, सोना, ग्रेनाइट व लौह अयस्क के भण्डार।

हिमांचल प्रदेश में बीते तीस वर्षों से जल प्रबन्धन व जैविक कृषि पर अध्ययन कर रहे उत्तरी शोध संस्थान के डायरेक्टर नरशष चैहान बताते हैं कि हमारे यहां पहाड़ों की देन है पानी कहने का आशय यह है कि धरती अर्थात वसुन्धरा के चारों तरफ समुद्र का जल है जो कि बेहद खारा है धरती पर लगी दुर्लभ वनस्पतियां, पेड़, औषधीय वृक्ष ही इस खारे पानी को फिल्टर (शोधित) करने के पश्चात् जल को पीने योग्य बनाती हैं पहाड़ जो हजारांे फुट गहरे धरती के व समुद्र के जल को पम्प कर एक्यूप्रेसर के दबाव की तरह जलस्तर को ऊपर उठाकर पानी के वाटर लेबिल को बढ़ाते हैं जिससे कि लोगों को पीने का पानी मुहैया होता है। उनका कहना है कि आप देख सकते हैं जहां पर किसी भी प्रकार का खनन, प्रकृति के संसाधनों का दोहन जारी है वहां पर जलस्तर डाउन स्ट्रीम में चला गया है।

राजस्थान के सीकर जनपद के कृषि वैज्ञानिक जगदीष प्रसाद पारिख जिन्हे देष विदेष में गोभी वाला के नाम से भी जाना जाता है ने स्पष्ट तौर पर अपने चालीस वर्षों के अनुभव के हवाले से कहा है कि पूरे राजस्थान में बुन्देलखण्ड की तरह पहाड़ों के जाल हैं यहां के पहाड़ों में भी विन्ध्य पर्वत माला की तरह ग्रेनाइट की परतें बीस से पचीस मीटर के बाद गहराई में जाने पर मिलती हैं जो कि कहीं कहीं पर दो से तीन सौ मीटर तक मोटी हैं। भूकम्प रोधी क्षमता को बढ़ाने का कार्य ये ग्रेनाइट की परतें ही करती हैं चूंकि बुन्देलखण्ड में सर्वाधिक काली मिट्टी है और ग्रेनाइट की चट्टानें काली मिट्टी की वजह से यहां बनी ईमारतोें में दरार तो ला सकती हैं लेकिन वह कभी भरभरा कर गिर नहीं सकतीं।

बुन्देलखण्ड के झांसी, ललितपुर, महोबा व बांदा जनपद में ग्रेनाइट के पत्थर व लौह अयस्क के भण्डारांे को छतरपुर में देखा जा सकता है अपने गर्भ में यहां हीरा, सोना, प्लेटिनम, पायरोप्लाइट, डायसफोर व लौह अयस्क के भण्डार छुपे हैं स्टील की तरह होने की वजह से यह न तो खराब होते हैं और न ही इनमें जंग ही लगती है।

सम्राट अषोक के जंगरोधी लौह स्तम्भ को छतरपुर की देन ही माना जायेगा लेकिन उत्तर प्रदेष व मध्य प्रदेष के माइनिंग विभाग के पास लौह अयस्क के किसी भी प्रकार का रिकार्ड मौजूद नहीं है। गौरतलब है कि बुन्देलखण्ड में लोहे का प्रयोग स्थानीय स्तर पर शताब्दियों से किया जाता रहा है। चाहें वह छठवीं शताब्दी में बना अषोक के निर्देष पर जंगरोधी लौह स्तम्भ हो या फिर अंग्रेजों के शासन में बनी तोप की बेयरिंग सभी में बखूबी इसका उपयोग किया गया है। साउथ ऐषियन एसोसिएषन आॅफ इकोनोमिक जियोलाजिस्ट के अध्यक्ष प्रोफेसर के0एल0 राय ने इस सन्दर्भ में कहा है कि जनपद छतरपुर में स्लैग (लौह अयस्क से लोहा निकालने के बाद प्राप्त कूड़ा) के बड़े बड़े टीलों को यहां देखा जा सकता है जो इस बात के प्रमाण हैं कि यहां के पहाड़ों में लौह अयस्क भी है।

नरसिंगपुर जनपद के लोहागढ़, तेंदूखेड़ा कस्बा के लोहार बस्तियों के बीच रहने वाले लोगों के घरों में आज भी इसके पुखता सबूत हैं। यहां कुछ वर्षों से लगातार जारी हरे भरे जंगल, खनिज सम्पदा, विषाल पर्वत श्रेणियां व ग्रेनाइट की परतों को अवैध खनन उद्योग के चलते नष्ट किया जा रहा है और साथ ही ट्यूबेल, हैण्डपम्पों की बाढ़ से रहा सहा जमीन का पानी भी खींचकर बुन्देलखण्ड को बंजर बनाने की मुहिम परम्परागत रूप से चली आ रही है। सैकड़ों वर्षों की हरियाली व पहाड़ों में छुपी पानी की सोंच को सामाजिक कार्यकर्ता आषीष सागर ने बताते हुए कहा है कि बांदा जनपद के दिवंगत कवि डाॅ0 केदारनाथ अग्रवाल की कविता ‘‘पानी को निहारता पत्थर’’ के माध्यम से भी समझा जा सकता है जिन्होने कभी केन के तटों में बैठकर कर्णवती और पानी के अन्तर सम्बन्धों को न सिर्फ आम लोगों की जीवन प्रत्याषा का अभिन्न हिस्सा बतलाया है वरन बुन्देलखण्ड में स्थायी जल प्रबन्धन के प्रकल्प के रूप में भी वर्षों पहले खनन उद्योग को पूरी तरह से बुन्देलखण्ड के लिये रेगिस्तान बनाने की तयषुदा साजिष ही करार दिया है।

कार्यशाला से सभार साराषं
आशीष सागर – प्रवास